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भारतीय शिक्षा प्रणाली- क्या है ग़लत?

आज देश के करोड़ों युवक युवतियां बी.ए.-एम.ए. कर के रोज़गार की तलाश में चक्कर काट रहे है जबकि सभी कल-कारखानों में हुनरमंद टेक्नीशियनो की भारी कमी है जर्मनी, चीन, जापान तथा कोरिया जैसे देशों में 90 प्रतिशत आठ-दस व बारहवीं पास करके लड़के-लड़कियां अल्पकालीन टेक्निकल ट्रेनिंग लेकर देश के लघु उद्योगीय कल-कारखानों में शत-प्रतिशत नौकरियां पा जाते है और पांच-दस साल की नौकरी करने के बाद वे अपने ही लघु उद्योग स्थापित करके आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनते है और लखपति व्यवसायी बन जाते है ।

आज जर्मनी, चीन, जापान तथा कोरिया के इन्हीं युवा तकनीशियनों के हाथों बने टी.वी.,रेडियो, टॉर्च, हैण्ड ड्रिल मशीन तथा कम्प्यूटर, घड़ियाँ व कैमरे तथा अन्य करीब 200 प्रकार के उपभोक्ता उपयोग के सामान अमेरिका, इंग्लैंड, भारत सहित दुनिया के अन्य सभी देशों में बुलंदी से बिक रहे है, जिसके फलस्वरूप जर्मनी, चीन, जापान तथा कोरिया में न तो भुखमरी है, न बेरोजगारी है, न कुपोषण है जबकि भुखमरी, बेरोजगारी, कुपोषण, भ्रष्टाचार तथा तकनीकी पिछडापन ही भारत की पहचान है। 

हमारे देश में तकनीकी शिक्षा के गुणवत्ता की बदहाली किसी से छिपी नहीं है आईआईटी पास इंजीनियरों की फ़ौज भी आज तक कम्प्यूटर्स की इंटीग्रेटेड सर्किट, डिजिटल कैमरे तथा मूवी कैमरे तक नहीं बना पाई है आज भी यह सब सामान जर्मनी, जापान, कोरिया जैसे देशों से ही आयात हो रहे हैं देश में टेक्नीशियनो की भरी कमी है जो अपने हाथो से गुणवत्तापूर्ण इंडस्ट्री की आवश्यकता के अनुरूप टेक्निकल कार्य कर सकें।  यू.पी.टी.यू. के बी.टेक इलेक्ट्रोनिक्स डिग्री धारक 90% छात्र JFET तक की पहचान नहीं कर सकते, मोडेम की सर्किट नहीं बना सकते देश के भ्रष्ट राजनेता मात्र अपना घर भर रहे है और उन्हें देश के युवाओं के भविष्य की चिंता नहीं है लेकिन किसी राजनेता को इन विषयों पर चिंतन करने को बाध्य भी नहीं किया जा सकता है। 

आवश्यकता इस बात की है कि सभी हाईस्कूल, इंटर स्तर के प्राइवेट विद्यालय तथा अन्य शिक्षण संस्थायें अपने पाठ्यक्रमों में लघु उद्योगीय टेक्निकल कोर्सेस प्रारम्भ करें जिससे कि सामान्य विद्यार्थियों का टेक्निकल ज्ञान बढ़े और वे स्वयं स्वरोजगार हेतु प्रोत्साहित हों।  लघुस्तरीय टेक्निकल कोर्सेस की सरकारी मान्यता की बाध्यता अब बेमानी है क्यों कि तकनीकी प्रशिक्षण संस्थाओं को मान्यता देने वाली नियामक बॉडी एआईसीटीई तथा मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया तक के अध्यक्ष पद पर आसीन अधिकारी तथा उनके अन्य उच्च पदस्थ अधिकारियो के घरों से मान्यता देने के लिए वसूली गयी रिश्वत जैसी करोड़ों रुपयों की धनराशि पिछले तीन सालों में बरामद की जा चुकी है । और उनके अधिकारी एक के बाद एक जेल की हवा खा रहे हैं। 

इसके साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि इन्ही नियामक संस्थाओं द्वारा मान्यता प्राप्त देश के सभी प्रदेशो के तकनीकी डिग्री, डिप्लोमा एवं औद्योगिक प्रशिक्षण विद्यालयों में पढाई-लिखाई शून्य है इन विद्यालयों के उत्तीर्ण 98 प्रतिशत छात्रों का तकनीकी सैद्धांतिक तथा प्रैक्टिकल ज्ञान इंडस्ट्री की आवश्यकताओ की पूर्ति करने में असक्षम है

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1 Comment

  • by John Howard
    Posted March 20, 2019 3:51 pm 0Likes

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